panchakarma therapy एक आयुर्वेदिक treatment

panchakarma therapy एक आयुर्वेदिक treatment

panchakarma  therapy एक  ayurvedic treatment  है ! जो रोगो के उपचार में काम आती है

आज हम जानेंगे panchakarma और इसके उपचार और इससे होने वाले फायदों के बारे में

panchakarma therapy एक आयुर्वेदिक treatment

panchakarma आयुर्वेद का मुख्य सुधिकरण उपचार है !

panchakarma ५ प्रकार की अलग -अलग चिकित्साओं का मिश्रण है !पंचकर्मा आयुर्वेद की एक ऐसी पद्धति है

जिसकी मदद से हम विषैले पदार्थो को शरीर से बाहर  निकालते है !

panchakarma ५ प्रकार की पद्धतियों का समिश्रण है जो इस प्रकार से है !

१.वमन
२. विरेचन
३. नस्य
४. बस्ती
५. रक्त मोक्षणं

इन सभी पद्धतियों का काम हमारे शरीर में दोषो का संतुलन बनाना है ! इनका काम हमारे शरीर का शुद्धिकरण करना  है !

इन सभी पद्धतियों के दवारा अपशिस्ट पदार्थो के उत्सर्जित करने वाले स्थानों से इन विषेले पदार्थो को बहार निकला जाता है !

अब बात करते है इन पद्धतियों की तो इनको शुरू करने पहले २ अन्य प्रिकिर्याएँ  करनी होती है !

१. स्नेहन

२. संवेदन 

सबसे पहले बात कर लेते है स्नेहन की तो इस विधि में पुरे शरीर पर तेल लगाया जाता है ! और मालिश की जाती है !

जिसकी वजह से हमारे उत्तक मुलायम और लचीले होते है !

संवेदन में शरीर से पसीना निकाला जाता है ! विषैले पदार्थो को पिघलाया जाता है ! उनको शरीर से बाहर निकलने के लिए उन्हें गति दी जाती है !

ये संवेदन की परीकिया सनेहँ की परिकिरिया के तुरंत  बाद की जाती है !ये दोनों प्रकार की  परिकिरिया संपन्न होने के बाद व्यक्ति वमन के लिए तैयार होता  है !

१. वमन : 

इसको उलटी चिकित्सा भी कहते है इस पद्धति का उपयोग तब किया जाता है !

जब व्यक्ति ठण्ड ,खांसी , दमे  आदि से परेशान हो ! तब व्यक्ति को ओषधियो का उपयोग कर उलटी करवाई जाती है !

जिससे स्वांस नाली में जमा कफ को बाहर निकाला जाता है !यह उन व्यक्तियों के लिए है जिनमे ऊंच कफ असंतुलन पाया जाता है !

इसमें व्यक्तियो को औषधियों का काढ़ा दिया जाता है जिससे वयक्ति उलटी करता है
वमन के बाद रोगी को मलमूत्र त्याग ,वायु विकार ,खांसी ,छींक आदि को नहीं दबाने की सलाह दी जाती है !

इस पद्धति के बाद व्यक्ति हल्कापन महसूस करता  है !

panchakarma therapy एक आयुर्वेदिक treatment
२. विरेचन : 

जब बहुत ज्यादा पित्त पित्ताशय  ,यकृत व छोटी आंत में जमा होता है या स्त्रावित होता है जिसका परिणाम होता है !

शरीर में फुंसी ,फोड़े ,कील मुहासे ,उल्टी ,पीलिया  आदि ! इसको दूर करने के लिए इस पद्धति का प्रयोग किया जाता है !

इस पद्धति में पित्त विष जीव शरीर से अलग किया जाता है !इस पद्धति में कई प्रकार के औषधीय प्रयोग किये जाते है !

जैसे चोकर ,गाये का दूध ,अरंडी तेल ,आदि का प्रयोग के बाद सिमित और नियंत्रित आहार लेना होता है !

शुगर ,तवचा रोग ,बवासीर ,कृमि आदि के रोगी पर यह पद्धति अपनाई जाती है !

३. बस्ती : 

ये सबसे महत्वपूर्ण पद्धति है जिसकी मदद से हम सभी ३ दोषो ,वात ,पित्त ,कफ को मलाशय से बहार निकलते है !

वात मुख्य रूप से बड़ी आंत में उपस्थित होता है !लेकिन अस्थि ऊतक भी वात का स्थान है !इसलिए मलाशय के दवारा ओषधि का प्रयोग अस्थि उत्तक को प्रभावित करता है !

इसलिए गुदा से भी ओषधि का प्रयोग करने पर वह गहरे ऊतकों जैसे की अस्थियो में जाती है और वात विकारो आदि को दूर करती है !

इस पद्धति का प्रयोग विभिन्न रोगो के ईलाज में किया जाता है ! जैसे : पीठ दर्द ,पाचन विकार ,जनन समता ,यौन रोग ,आदि !

४. नास्य :

नाक के दवारा औषधि का प्रयोग नास्य कहलाता है !और नाक मस्तिष्क का दवार मार्ग है !

शरीर का ऊपरी हिस्सा जैसे गला ,नाक ,सिर के हिस्सों में जमा अधिक द्रव को नाक की सहायता से  निकाल दिया जाता है !

जैसे हम भांप वगैरह लेते है उसी प्रकार ओषधीय ग्रहण  होती है ! इस पद्धति के दवारा श्वास नली को साफ़ किया जाता है !

इस पद्धति के प्रयोग से विभिन्न बीमारियों का इलाज़ होता है जैसे :नाक सुखना ,गर्दन का कड़ापन,पक्षाघात ,सर के रोग आदि !

५. रक्त मोक्षणं :

 इस पद्धति में रक्त को बहने देना होता है !  रक्त में शामिल विष जीव को रक्त के माध्यम से बाहर निकाला जाता है

इस विधि से रक्त साफ़ होता है और रक्त से जनित सभी बीमारियों से मुक्ति मिलती है !बार  बार होने वाले संक्रमण और तनाव आदि से छुटकारा मिलता है !
नमक ,चीनी ,खट्टे पदार्थ आदि रक्त के लिए जीव विष है इनका परहेज करना चाहिए !

 

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